मंगलवार, 25 जनवरी 2011

समझ नहीं पा रहा हूँ अपने देशवासियों को गणतन्त्र दिवस की बधाई दूँ या शोक-सांत्वना !



किस बात की बधाई दूँ मैं?क्या उस संविधान के लिए जो उन नियमों का संग्रह है जिसे अंग्रेजों के द्वारा हमें गुलाम बनाए रखने के लिए बनाया गया था?उस संविधान के लिए जिसके बनने के बाद खुद भीम राव अंबेदकर भी दुःखी थे ! उन राजेन्द्र प्रसाद और अंबेदकर जैसे विद्वानों के साथ क्या मजबूरी थी ये तो वो लोग ही जानें पर भीम राव अंबेदकर जी ने इसके बनने के बाद ही कह दिया था कि इस संविधान से देश का भला होना संभव नहीं है,जहां तक संभावना बुरा होने की ही है।इस संविधान में कोई शक्ति नहीं है कि ये देश का भला कर सके।बस एक ही उपाय है कि ये अगर भले व्यक्तियों के हाथ में जाय तो शायद देश का भला हो पाए।और ये बात मुझे बताने की आवश्यकता नहीं कि ये किसी देशभक्त व्यक्ति के हाथों में आने के बजाय अंग्रेज़ के एक नुमाइंदे के हाथों में गया और फिर उसका परिणाम सबके सामने है ही कि किस हद तक हम अभी भी गुलाम बने हुए हैं अंग्रेजों के और किस तरह चूसा जा रहा है भारत को।

हमारा भारत देश अगर टुकड़ों में ना बांटा होता और आपस में ही हम एक-दूसरे के शत्रु ना बने होते तो इन मुगलों या अंग्रेजों की औकात नहीं थी कि हम पर शासन कर ले लेकिन हमारी ही शत्रुता का लाभ लेकर इन लोगों ने बिल्ली-बंदर की कहानी को चरितार्थ कर दिया और हमारा एक-एक बूंद खून निचोड़ लिया।फिर ये सब देखने के बावजूद क्या औचित्य था हमारे देश में इन शक्तिशाली राज्यों के अस्तित्व का??क्यों भारत को एक देश की बजाय 28राज्यों में बाँट दिया गया???

भारत को छोटे-छोटे गांवों और गांवों के समूहों में बांटकर शासन चलाया जा सकता था।

भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता थी एकता की तो फिर क्यों भारत की कोई राष्ट्र-भाषा नहीं है अबतक??क्या बिना किसी एक भाषा के राष्ट्र एकजुट हो सकता है??आज झारखण्ड से सटे हुए राज्य बंगाल में ही जाता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे किसी विदेश में गया हूँ क्योंकि ना तो वहाँ के लोग हिन्दी समझते हैं ना ही वहाँ किसी होटल या जगह का नाम हिन्दी अथवा अङ्ग्रेज़ी में लिखा हुआ होता है।हर जगह बस बंग्ला ही लिखा होता है और लोग सिर्फ बंग्ला ही समझते हैं।हमारा देश बंटा हुआ है भाषा और राज्य के नाम पर और दुश्मन लूट रहे हैं हमें।

इस संविधान ने हमें इतनी भी शक्ति नहीं दी है कि हम एक शक्तिशाली,चरित्रवान व्यक्ति के हाथों में देश के शासन की बागडोर थमा सके।अगर शक्ति होती तो क्या आज यही हाल होता हमारा कि 60सालों में हम बस लूटे ही गए।ये है हमारे संविधान की महत्ता की कोई भी खूनी-डाकू,अनपढ़ जिसने अपना पूरा जीवन जेल में बिताया हो और जेल से बाहर निकलते ही हमारा नेता बन जाता है।एक मूर्ख जिसे छोटा सा परिवार चलाने की भी बुद्धि नहीं वो देश चलाने का कार्य-भार संभाल लेता है।जिस देश की अधिकांशतः जनता मूर्ख हो और हरेक के पास अगर प्रधानमंत्री को चुनने का अधिकार हो तो उस देश में कैसा प्रधानमंत्री होगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।ये है हमारा संविधान कि कोई भी प्रतिभावान बच्चा आज डॉक्टर,इंजीनियर और आई॰ए॰एस॰ बनने के सपने तो देखता है लेकिन वही आई॰ए॰एस॰ जो नेता का गुलाम होता है उस नेता को बनने का सपना कोई नहीं देखता।पिता अपने पुत्र के आई॰ए॰एस॰ बनने पर तो गर्व से सीना चौड़ा कर लेता है लेकिन नेता बनने के नाम पर ही वो अपने आपको अपमानित महसूस करने लगता है वो।आखिर क्यों आज सत्ता सिर्फ गुंडे-मवालियों के हाथ में आकर रह गई है।क्यों एक पिता अपने पुत्र को सैनिक बनने तो भेज देता है लेकिन एक नेता बनने नहीं।क्यों एक किरानी के आवेदन में भी बारहवीं तक प्रथम श्रेणी की योग्यता आवश्यक होती है लेकिन नेता के लिए प्रथम कक्षा तक की योग्यता भी नहीं।देश के चलाने के लिए एक शासक चाहिए या सेवक???इस बात को समझने की आज अत्यंत आवश्यकता है कि कोई भी सेवक या गुलाम मानसिकता का व्यक्ति नेता बनकर देश का भला नहीं कर सकता।नेता में सेवक के साथ-साथ राजा की भी योग्यता होनी चाहिए।आज देश में इतना भ्रष्टाचार का यही कारण है कि लोगों के मन में यह गलत धारणा बैठा दी गई है कि नेता सेवक मानसिकता का होना चाहिए।

आज सिर्फ वोट की राजनीति के लिए कश्मीर पाकिस्तान को दिया जा रहा है,देश टुकड़े-टुकड़े में बंट रहा है,मृत्यु-सजा पाए हुए देश के दुश्मन को भी राष्ट्रपति से ज्यादा सुख-सुविधाएँ प्रदान की जाती है,बांग्लादेश से करोड़ों देश को दुश्मनों को बुलाया जा रहा है सिर्फ वोट के लिए।

जब देश की जनता मूर्ख हो तो ऐसी स्थिति में आम जनता को प्रधानमंत्री चुनने का अधिकार देना देश की बर्बादी है।आज देश की बर्बादी के लिए दो व्यवस्था मुख्य रूप से उत्तरदायी है-एक शिक्षा व्यवस्था और दूसरी चुनाव व्यवस्था।

तनिक विचार करिए कि जिस व्यक्ति को हम जानते नहीं उस व्यक्ति को विधायक या सांसद चुनने का निर्णय कैसे ले सकते हैं हम।और बस कुछ दिनों के चुनाव-प्रचार में कैसे संभव है उसे जान -समझ पाना??इसकी दूसरी सबसे बड़ी बुराई कि इन कुछ दिनों के चुनाव-प्रचार के दौरान वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए उम्मीदवार हर कुकर्म करने को तैयार हो जाता है।पानी की तरह धन को बहाता है,लोगों के ईमान की खरीद-बिक्री करता है और लोगों की हत्या तक कर देता है।इसी वोटों की राजनीति के कारण ही आज भारत जाति-धर्म और भाषा के नाम पर लड़ता रहता है।ममता बनर्जी खुले आम कहती है कि वो बंगाल के वोटों से जीतती है तो किसी अन्य राज्य की चिंता क्यों करे वो?देख लिजिए किस तरह से आज वो भेदभाव कर रही है रेल में।इस क्षेत्रवाद का दोषी हमारा संविधान ही तो है।हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या है वोट राजनीति और इसका पूरा-पूरा उत्तरदायी है हमारा संविधान।वो संविधान जिसने ना तो विधायक और सांसद के लिए कोई योग्यता निर्धारित की है और ना ही इसे चुनने वाले के लिए कोई योग्यता निर्धारित की है जबकि होना ये चाहिए था कि नेता के लिए भी डॉक्टर,इंजीनियर और आई॰ए॰एस॰ की तरह प्रतिस्पर्धा परीक्षा की उत्तीर्णता आवश्यक होती और साधारण जन अपने गाँव में एक मुखिया को चुनते फिर वो मुखिया अपने से ऊपर वाले को चुनता और फिर इसी तरह क्रमशः चलता रहता और इस सबसे निचले स्तर पर साधारण जन की भले कोई योग्यता ना होती लेकिन मुखिया की भी योग्यता अनिवार्य होती।इस प्रक्रिया से कम-से-कम देश में इस तरह ना तो वोट की गंदी राजनीति हो पाती और ना ही गुंडे-मवाली गद्दी पर बैठ पाते।अभी तो हाल ये है कि जब-मन-तब जो-मन-सो मुंह उठाए चले आते हैं हमारे नेता बनने जिसे खाने के बाद अपना मुंह धोने तक का भी अक्ल नहीं।

हमारा देश तो वो देश था जहां चुटकी में जटिल से जटिल न्याय संपादित कर दिया जाता था पर आज छोटा-से-छोटा विवाद भी सुलझ नहीं पाता और न्याय होते-होते न्याय पाने वाला ही संपादित हो चुका होता है।बताइए भला किस बात पर खुश होऊँ मैं अपने संविधान से।इस संविधान ने तो हमारे देश को एक भ्रष्ट देश बनाकर रख दिया।हमारा देश तो वो देश था जहां की धरती महान दानवीरों की फसलों से लहलाया करती थी फिर आज ये लुटेरों की धरती कैसे बन गई।राजा शिवि ने एक कबूतर के लिए अपने अंग काटकर बाज को दे दिए।कर्ण ने तो जन्म लेते ही दान देना शुरू कर दिया और अपना सबसे पहला दान अपनी माँ को ही दिया।ऐसे महान दानियों की धरती थी हमारी।

हमारे देश तो राजा हरिश्चंद्र जैसे सत्यवादी पुरुष का देश था फिर ये झूठों का देश कैसे बन गया।"रघुवीर रीत सदा चली आई प्राण जाई पर वचन ना जाई" की नीति कलयुग में भी आजादी के पहले तक निभाते थे हमारे पूर्वज जिसके कारण ही अकबर राजपूतों से मित्रता कर इतना महान कहलाने लगा।

हमारा देश तो त्यागियों का देश था फिर इतना स्वार्थी कैसे बन गया!हमारे देश में तो भीष्म जैसे निस्वार्थी वीर पुरुष थे जो जीवन भर दूसरों के लिए बड़ा-से-बड़ा दुःख सहते रहे और अपने लिए छोटी-से-छोटी खुशी का भी त्याग करते रहे और आज हम अपने छोटे से स्वार्थ के लिए भी दूसरों को बड़ा-से-बड़ा दुःख देकर खुशी प्राप्त करते हैं।

अब आप ही बताइए कि किस बात की बधाई दूँ ?कौन सी खुशी और किस बात का अभिमान??जिस कविता को लार्ड वायसराय की स्तुति के लिए बनाया गया था वही हमारा राष्ट्रगान बना हुआ है और जिस "वंदे मातरम" गीत ने लाखों भारतीयों के दिलों में राष्ट्रभक्ति की भावना को जगाकर एकता लाई थी और देश को आजादी दिलाई थी वो गीत आज मजहब के नाम पर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।जो केसरिया भगवा रंग आदि काल से भारतीयों की वीरता का प्रतीक रहा है,जिस भगवे झण्डे के नीचे भारतीय वीर इकट्ठे हुए और देश की आजादी की लड़ाई लड़ी उस पवित्र भगवे झण्डे को आज संप्रदाय का नाम देकर अपमानित किया जा रहा है।भारत की सारी सभ्यता-संस्कृति सनातन धर्मियों(हिंदुओं) के साथ जुड़ी हुई है पर उन सारी प्राचीन सभ्यता-संस्कृतियों से संप्रदाय के नाम पर घृणा की जाती है।आज हम धोती पहनते हैं तो भारतीय नहीं एक संप्रदाय(हिन्दु) कहलाते हैं।अपने पूर्वज राम-कृष्ण,भीष्म,शिवाजी,पृथ्वीराज पर गर्व करते हैं तो देशभक्ति नहीं सांप्रदायिकता है।आज हमारे देश का कोई धर्म नहीं और इस बात पर गर्व करते हैं हम।मैंने तो हमेशा बड़े-बूढ़ों से यही कहते सुना है कि बेटा यह काम मत करो ये अधर्म है यानि धर्म का तात्पर्य हमारे द्वारा किए कार्य से है।हम कोई भी कार्य करें तो वो कार्य या तो धर्म होगा या अधर्म फिर इस धर्म-निरपेक्षता का क्या अर्थ??धर्म का अर्थ अच्छे कार्यों से हैं फिर धर्म निरपेक्ष आदमी कोई अच्छा कार्य कैसे करेगा??धर्म और अधर्म-दो ही प्रकार के कर्म होते हैं।अच्छा कर्म धर्म और बुरा कर्म अधर्म।इन दो कर्मों के अलावे और कोई कर्म नहीं।इसलिए बेशक धर्म-निरपेक्षता अधर्म है।अब आप ही बताईए कि जो देश अपने आपको अधार्मिक कहलाकर गर्व करता हो क्या वो देश कभी विकास कर सकता है??हमारे पूर्वजों ने रामायण और महाभारत में सबसे बड़ा धर्म राष्ट्रधर्म को बताया है।उस ऐतिहासक पुस्तक को अगर भारतीय इतिहास के बाजाय एक किसी खास पंथ या संप्रदाय का अंधविश्वास बताकर अपमानित किया जाएगा तो वो देश क्या कभी विकास कर पाएगा??

कैसी आजादी और कैसा संविधान!!लार्ड माइकाले जब सर्वेक्षण करने भारत आया था तो यहाँ की शल्य चिकित्सा इतनी विकसीत थी कि काटा हुआ सर भी धड़ से जोड़ दिया जाता था।यहाँ का नाई भी एक कुशल शल्य चिकित्सक हुआ करता था।ये उस समय की बात है जब विदेशों में शल्य चिकित्सा की शुरुआत भी नहीं हुई थी उस समय यहाँ अनगिनत मेडिकल कॉलेज थे।यहाँ के सिर्फ मन्दिर ही इतने धनी हुआ करते थे जिसे लूटकर विदेशी मलामाल हो जाया करते थे और आज हम कंगाल कहे जाते हैं। ब्रिटीश संसद में मैकाले कहता है कि उसने पूरे भारत देश का भ्रमण किया परंतु कहीं उसे कोई गरीब या भिखारी नहीं दिखा।सब के सब सुखी थे यहाँ और आज ये हाल है हमारे देश का।उस प्रमाण को भी जोड़ रहा हूँ मैं यहाँ पर।
अब आप ही बताइए कि आजादी के भारत की इतनी दुर्दशा पर आपलोगों को बधाई दूँ या शोक सांत्वना॥?

ना तो मैं बधाई दूंगा और ना ही सांत्वना।मैं इस गणतन्त्र दिवस पर आह्वान करूंगा कि हे भारतपुत्रों अपने हृदय से कायरता निकालो,देखो अपने भारत माँ की दुर्दशा को।आज हमारा खून इतना ठंडा हो चुका है कि हर रोज अपने आँखों के सामने इतना अन्याय होते देखते हैं फिर भी हमारा खून गर्म नहीं होता,फिर भी कोई क्रांति नहीं होती।ब्रह्मचर्य परीक्षण के बहाने अपनी पोती के साथ सोने वाला व्यक्ति पूरे देश का बापू और दूसरा छिछोरा काकू बन जाता है दूसरी ओर भगत सिंह,सुखदेव और सुभाष जैसा सच्चा देशभक्त आतंकवादी घोषित कर दिया जाता है फिर भी हमें बुरा नहीं लगता।हमारे देश का मुकुट कश्मीर आज हमारे सर से उतारा जा रहा है इसी संविधान के धारा 370 के अंतर्गत और फिर भी हम शान से गणतन्त्र दिवस मनाते हैं।हमें मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी के बजाय इस देश की बागडोर अपने हाथ में लेनी है और बदलनी है इस पूरे संविधान को फिर से लिखेंगे हम अपना नया संविधान जो नए खून के द्वरा ही लिखा जा सकेगा इस बूढ़ों के द्वारा नहीं।

इसलिए हे भारतपुत्रों आगे आओ और बचा लो अपने भारत माँ की लुटती हुई इज्जत को वरना भारत का अस्तित्व ही मिट जाएगा।

अंत में बस यही इच्छा है मेरी कि सब युवा वीरों के मुंह से बस यही निकले कि हम रहे हैं माँ,हम रहे हैं।बहुत हो गया अब और नहीं।इतने दिनों तक जो आपपर अत्याचार हुए इसके लिए क्षमा करो माँ अब हम इन दुश्मनों के एक-एक कुकर्म का हिसाब लेंगे।किसी को माफ नहीं करेंगे।दुश्मनों से एक-एक अत्याचार को सूद सहित वापस लेंगे हम और आपको फिर से सोने की चिड़िया बनाएँगे हम,फिर से इस देश में दूध की नदियां बहेगी,और बच्चा शेर के दाँत से गिनती गिनना सीखेगा।

7 टिप्‍पणियां:

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    एक विचारोत्तेजक लेख.

    आत्म-गौरव गान करता आपका यह लेख बेहद सुन्दर है.
    वास्तविकता को सामने लाने के लिये आपकी अभिव्यक्ति काबिले-तारीफ़ है.

    फिर भी जो बुरी बातें अच्छे कार्यों के लिये रूढ़ हो जाएँ उन्हें स्वीकार ही लेना चाहिए. देर-सबेर उसमें परिवर्तन अवश्य लायेंगे.

    देश का 'राष्ट्रगान' देश का 'गौरव-गान' नहीं फिर भी उसका हमें सम्मान करना है क्योंकि वह पूरे [नासमझ] देश को जोड़ने का प्रतीक बन गया है.
    बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो हमें सिम्बोलिक रूप में स्वीकार करना पड़ता है. यदि ये कहूँ कि 'हिन्दू' शब्द में भी गाली की गंध बसी है लेकिन फिर भी वह आज़ एक बड़े समुदाय का संबोधन बन गया है और उसे एक छत के नीचे लाने के लिये प्रयुक्त होता है.


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  2. आपके लेख मे आग है आशा है इसको पढ़कर भारत के युवाओ का खून गर्म होगा.
    भारत के सविधान को बदलना बहुत जरुरी है. लेकिन ये सोये हुये लोग जागना ही नही चाहते
    जिसका फायदा देशद्रोही लोग उठा रहे है

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  3. अपने ब्लाग को ब्लाग एग्रीगेटर जैसे हमारीवाणी आदि पर पंजीक्रत कर दीजिये जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगो तक आपके लेख पहुचे

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  4. बहुत सुदर और देशभक्ति से परिपूर्ण लेख

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  5. पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ पर आपके ब्लॉग पर आकर प्रसंता हुई जितनी तारीफ़ की जाय कम है ।प्रभावशाली लोगों के आगे जैसे हमारी व्यवस्था नतमस्तक नज़र आती है। कानून के दो चेहरे साफ-साफ दिखाई देते है। अमीर और गरीबी की खाई में मुल्क लगातार बंटता जा रहा है। देश की 90 फीसदी इनकम पर 10 फीसदी लोग कब्जा जमाकर बैठे है।अरे हुक्मरानो, देश के लिए ना सही, खुद के लिए ही सोचो...
    उत्तम विचार,अच्छी प्रस्तुति हार्दिक शुभकामनाएं!

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