गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

आखिर क्यों नहीं अपनाती है इन समलैंगिकों को ये सभ्य समाज?


क्या अधिकार है इस सभ्य समाज को इनसे घृणा करने का जबकि ये इन्हीं की देन है?आखिर इस फसल का बीज इसी सभ्य समाज ने तो बोया है और बोना जारी भी रखा है।बीज बोते समय तो बहुत खुश होते हैं,पेड़ ज्यों-ज्यों बड़ा होता रहता है उसे देखकर उतना ही खुश होते रहते हैं पर जब फल आते हैं तो विश्वास नहीं कर पाते कि ये फल उसी बीज का है।
हा.......कितने हंसी की बात है कि अपने ही जिस पौध को इतने प्यार से सींच रहे थे उसी के फल से इतनी घृणा!!!

घर में बच्ची ने जन्म लिया नहीं कि उसे लड़कों जैसा डॉक्टर,इंजीनियर,आई॰ए॰एस॰,आई॰पी॰एस॰,बनाने के सपने देखने शुरू कर देते हैं।उसे बेटी के बजाय बेटा-बेटा कहकर पुकारने में आनंद प्राप्त करते हैं।बचपन से ही उसके मन में यह बात डालना शुरू कर देते हैं कि उसे लड़कों जैसा बनना है।बच्ची को एहसास हो जाता है कि लड़की का महत्त्व लड़कों से कम होता है इसलिए वो भी अपना सब कुछ झोंक देती है लड़का बनने के लिए।अपना पहनावा-ओढ़ावा,आचरण,अपने विचार सब कुछ लड़कों जैसे बनाने में लग जाती है वो।चाहे लड़कों जैसे बाईक चलाना हो या फिर नशीली पदार्थों का सेवन करना हो या लड़कों जैसा बेशर्मी करना हो।लड़कों की हर चीज को कॉपी करना शुरू कर देती है वो और जवान होते-होते सिर्फ आचरण से ही नहीं बल्कि मन से भी वो लड़का बन जाती है।मन का असर तन पर पड़ना स्वाभाविक ही है।पूरे शरीर को और शरीर के अंदर के हार्मोन्स को मन ही तो नियंत्रित करता है... अब जब वो लड़का बन चुकी है तो भला उसे लड़कों में रुचि क्यों होगी..??स्वाभाविक सी बात है कि किसी लड़के के बजाय अब उसे अपने व्यवहार के विपरीत शर्मीली,मासूम सी कोई लड़की ही पसंद आएगी॥तो इसमें उस बेचारी का क्या दोष!!मैं तो नहीं मानता हूँ कि उसका कोई दोष है।

यह समाज भले उसे ना अपनाए पर कोई हक नहीं बनता इस सभ्य समाज को उसे भला-बुरा कहने का क्योंकि जो कुछ भी हुआ इसमें नुकसान तो उस लड़की का ही हुआ जिसका जिम्मेदार यही सभ्य समाज है वो समलैंगिक बन चुकी लड़की नहीं।।
ये तो थी स्त्री समलैंगिकता की बात।अब जहां तक पुरुष समलैंगिकता की बात है तो इन्होंने तो समाज का इतना उपकार किया है कि समाज को फूलों की माला लेकर इनका स्वागत करना चाहिए।लेकिन यह विडम्बना ही है कि इसके विपरीत इन्हें समाज से तिरस्कार ही मिलता है।
जो समाज लड़की को अपने सर का बहुत भारी बोझ समझता है और बेचारी को जन्म लेने से पहले ही मार डालता है जिसमें कोई-कोई व्यक्ति तो लगातार 4-5(या ज्यादा ही) बच्चियों तक की हत्या कर डालने में भी संकोच नहीं करता है तो ऐसे लोगों पर तो बहुत बड़ा उपकार किया है इन पुरुष समलैंगिकों ने।कम-से-कम इस तरह के लोगों को तो कोई हक नहीं बनता है समलैंगिकों को देखकर नाक सिकोड़ने का।जिस समाज में लड़का-लड़की के अनुपात में इतनी ज्यादा असामानता है उस समाज के लिए तो पुरुष समलैंगिकता एक वरदान की तरह ही है।हाँ,,ऐसी स्थिति में जब लड़के की तुलना में लड़कियों का अनुपात इतना कम हो तो स्त्री समलैंगिकता भले ही अभिशाप हो सकती है समाज के लिए।
एक और महत्त्वपूर्ण बात कि भ्रूण-हत्या करने वाले को तो अधिकार नहीं ही है पुरुष समलैंगिकों से नफरत करने का पर इसके साथ-साथ उनलोगों को भी अधिकार नहीं है जो अपनी बेटी के बेटी होने पर गर्व नहीं कर सकते और उन्हें बेटा बनाने पर तुले होते हैं क्योंकि धारा के प्रवाह के लिए दो विपरीत ध्रुवों का होना आवश्यक है और इसलिए आपने जब लड़कियों को अपना ध्रुव बदलने पर विवश कर दिया तो धारा के प्रवाह के लिए तो लड़कों को भी तो अपना ध्रुव बदलना ही पड़ेगा ना??तो इस प्रकार ये भी तो इस सभ्य समाज पर पुरुष-समलैंगिकों का एक प्रकार का उपकार ही हुआ ना...?
लड़कों के मन को अपनी कठोर प्रकृति के विपरीत कोमल-नाजुक,सभ्य,सुशील,संस्कारी एक सीधी-साधी प्यारी सी लड़की आकर्षित करती है।जब लड़कियाँ लड़का बनने के प्रयास में यह सब अपना स्वाभाविक-प्राकृतिक गुण खो चुकी है तो भला लड़के कैसे आकर्षित होंगे इनके प्रति और कैसे शादी करेंगे,क्यों एक लड़का लड़कों जैसे ही गुण रखने वाली किसी लड़की से शादी करे।अगर उसने लड़की के गुण रखने वाले किसी लड़के से शादी कर ली तो इसमें आपका क्या गया और आप कौन होते हैं उसे बुरा भला कहने वाले क्योंकि आपने तो कुछ नहीं खोया बल्कि आपने तो पाया- संतान के रूप में लड़की के बदले लड़के को जबकि इनलोगों ने तो बस खोया ही खोया पाया कुछ भी नहीं..
इस समाज को तो उन लड़कों को धन्यवाद देना चाहिए जिन्होंने लड़का होकर अपने अंदर लड़की वाले गुण विकसित कर लिए क्योंकि ये समाज के सच्चे शुभचिंतक हैं आपकी तुलना में।आप जब एक ध्रुव को बदलने में मशगूल थे तब समाज के इस सच्चे शुभचिंतकों को एक ही उपाय दिखा धारा के प्रवाह को बनाए रखने का और इन्होंने अपना ही ध्रुव बदल लिया।
आज जब मैं लड़कियों की तरह लंबे-लंबे बाल बढ़ाए हुए,हाथ में कंगन(bracelet),गले में सीकरी(हार),उंगली में अंगूठी,कान में बाली और शरीर पर गोदने(टैटू) गुदे हुए लड़के को देखता हूँ तो उनके प्रति मेरा सर श्रद्धा से झुक जाता है।
कुछ लड़के तो दुपट्टा वाले टी-शर्ट भी पहनने में कोई संकोच नहीं करते॥
लड़कियां इन चीजों(दुपट्टा,आभूषण) को उतारकर फेंक रही है और लड़के अपना रहे हैं।दुपट्टे को लड़कियों की इज्जत समझी जाती थी और सीना तानकर चलना लड़के की शान समझी जाती है।पर अब तो लड़कियां लड़कों की तरह गंजी(यानि T-Shirt) पहनकर अपना सीना तानकर चलती है और जिस दुपट्टे को लड़कियां पिछड़ेपन की निशानी समझ उतारकर फेंक चुकी है उसे ही लड़के अपना रहे हैं....
इसलिए आपलोग इनलोगों को जितनी भी नफरत भरी निगाहों से देखिए मैं तो इनलोगों का समाज पर उपकार मानकर इनपर अपनी आभार-दृष्टि और दयाभरी दृष्टि ही डालता हूँ।दया इसलिए कि अपने प्राकृतिक स्वभाव को बदलने में इन्हें कष्ट तो सहना ही पड़ा होगा ना......हाँ मुझे एक शिकायत तो रहती है इनलोगों से;क्योंकि पहले जहां लड़कियों से दूरी और लड़कों से नजदीकी को मेरा सभ्य संस्कार माना जाता था अब इसी संस्कार के कारण कभी-कभी लोग मुझे गलत दृष्टि से भी देखने लग जाते हैं।एक दिन मेरे कक्षा की एक लड़की ने भी मुझ पर व्यंग्य कर दिया।एम॰बी॰ए॰ कॉलेज में खुद सर ही लड़के-लड़कियों को एक-दूसरे के करीब आने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं तो ऐसे में मेरे दोस्त लोग इस अवसर का खूब लाभ उठाने लगे पर मुझे अनावश्यक किसी लड़की के करीब आना अच्छा नहीं लगा और मैंने सबसे दूरी बनाए रखी तो एक दिन एक मुँहफट लड़की ने किसी बात पर कह ही दिया कि तुम्हारे अंदर हार्मोनल प्रोब्लम चुका है।इस बात से समझ सकते हैं कि लोगों की सोच कितनी बदल चुकी है।
अगर किसी दो लड़कों में गहरी दोस्ती है और वो ज्यादा-से-ज्यादा समय एक-दूसरे के साथ बिताते हैं तो लोग उनलोगों के बीच के पवित्र दोस्ती के रिश्ते को भी समलैंगिकता के रूप में देखने लगते हैं।पुरुष समलैंगिकों के कारण आज परिस्थिति इतनी विपरीत बन चुकी है कि पहले लड़कों के लड़कियों में रुचि लेने वाले कार्य को घृणित और लड़कों में रुचि रखने वाले कार्य को सम्मानित और गर्व वाली बात समझी जाती थी पर अब तो लड़कों का लड़कियों में रुचि रखने वाली बात को ही गर्व और लड़कों में रुचि रखने वाली बात को घृणित समझा जाता है॥दोस्ती जैसा पवित्र रिश्ता भी बदनाम हो गया।पर पुरुष समाज का एक हिस्सा होने के कारण मैं किसी पर आरोप भी तो नहीं लगा सकता क्योंकि जो भी कुछ हुआ उसके जिम्मेदार हम पुरुष समाज ही तो हैं।हम लोगों ने लड़कियों के दया-करुणा, प्यार और त्याग जैसे दैवीय गुणों को उसकी कमजोरी समझा और उसका अपमान करना शुरू कर दिया।अपमान तक तो बेचारी सह रही थी लेकिन बात जब दहेज-हत्या,भ्रूण-हत्या और शारीरिक प्रताड़ना तक पहुँच गई तो नारी भी अपना नारीत्व त्यागकर कठोर और बेशर्म पुरुष समाज का एक हिस्सा बनने के लिए विवश हो गई....
इसलिए मैं इन समलैंगिकों का आभारी तो रहूँगा ही क्योंकि पुरुष समलैंगिकता जितनी बढ़ेगी लड़कियों की इज्जत उतनी ही बची रहेगी,बलात्कार जैसी घटनाओं में भी कमी आएगी,दहेज जैसे अपराध कम होंगे और ससुराल में लड़कियों पर होने वाले शारीरिक उत्पीड़न जैसे जुल्म भी खत्म होंगे।है ना??
एक और महत्त्वपूर्ण बात कि समाज के इस पतन के लिए भ्रष्टाचार भी बहुत बड़ा उत्तरदायी है।देश में युवा बेरोजगारी के कारण दर-दर की ठोकरें खा-खाकर घायल होते रहे और अपनी इंसानियत को भूलते गए दूसरी तरफ नेता स्वीस बैंक में अपनी दौलत करोड़ों से अरबों और अरबों से खरबों में बनाने में लगे रहे।बेरोजगार लोगों को पैसा कमाना ही सबसे महान कार्य महसूस होने लगा और पत्नियों का घर में रहना उसे अखरने लगा।सिर्फ पैसे ना कमाने के कारण ही पुरुषों ने पत्नियों का महत्त्व कम आंकना शुरू कर दिया।पैसे का महत्त्व बढ़ते चले जाने के साथ-साथ लड़कियों का महत्त्व घटता चला गया।पैसे के इसी लोभ ने ही दहेज-हत्या और भ्रूण-हत्या जैसे घृणित भयानक अपराधों को जन्म देना शुरू कर दिया और लड़कियों को लड़का बनने पर मजबूर कर दिया और फिर समाज में बुराई आनी शुरू हो गई...
बुराई का कारण जो भी हो पर इन समलैंगिकों से घृणा करना मुझे उचित नहीं लगता बल्कि मुझे तो दया ही आती है इनलोगों को देखकर।इसलिए इनके लिए मेरे दिल में सहानुभूति है नफरत नहीं.......।

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