बुधवार, 12 जनवरी 2011

अंग्रेजों के लिए जो है उनकी लाचारी और विवशता वही हमारे लिए है शान-ओ-शोकतता

ये बात हास्यास्पद है पर अत्यंत दुःखद कि जो चीज अंग्रेजों की लाचारी है उसे हम अपनी शान बना लेते हैं।इसके उदाहरण तो अनगिनत हैं पर मैं कुछ उदाहरण दे रहा हूँ जो मेरी नजर में है।

उदाहरण से पहले मेरी एक बहुत छोटी सी कहानी-एक बार मेरा एक दोस्त बेर के पेड़ पर बेर के फल तोड़ रहा था।किसी कारणवश वो असंतुलित हो गया और नाचे गिर पड़ा।वो गिरा तो बहुत ऊंचाई से था पर उसके मित्र समूह में कुछ उसके विरोधी भी थे जो उसके गिरने पर हंसने लगे।तभी मेरे उस मित्र ने कहा कि हंस क्यों रहे हो सालों मैं पेड़ से गिरा थोड़े ही हूँ मैंने तो छलांग लगाई है वहाँ से।ह...हा...जब भी ये बात सोचता हूँ तो हंसी आ जाती है क्योंकि सच में उन विरोधियों का मुंह बंद कर दिया था उसने।

यही हाल मैं अपने भारतीयों का देखता हूँ पर यहाँ मुझे हंसी नहीं आती दुःख होता है।क्योंकि यहाँ स्थिति उल्टी है।विरोधी की जगह मेरे देशवासी हैं और मेरे चालाक मित्र की जगह मेरे दुश्मन।

आज युवा जिसे फैशन के नाम पर अपनाकर अपने आपको सभ्य या फ्रैंक(खुला विचार वाला) या बड़े बन जाने की तसल्ली देते हैं वो वस्तुतः अंग्रेजों की लाचारी है।

लगातार दो विश्व-युद्ध झेलने के बाद अंग्रेज़(लगभग सभी पश्चिमी देश) लोग काफी निराशा और दुःख में जी रहे थे।धन और जन की अपार क्षति हो गई थी।ऐसे में लोग खुशी को तलाश रहे थे।कहीं से भी थोड़ी से खुशी मिल जाती तो टूट पड़ते थे वो उसपर।इंसान के खुशी का सबसे बड़ा स्रोत है सेक्स।लोगों ने सेक्स में खुशी ढूंढनी शुरू कर दी।जिसे जहां जो मिल गया उसीके साथ लोगों ने सेक्स करना शुरू कर दिया।परिवार और मानव-समाज के सारे नियम टूट चुके थे।युद्ध में काफी संख्या में सैनिकों के मारे जाने से उनकी विधवाओं ने इस चीज को काफी बढ़ावा दे दिया।सरकार ने भी हालात को देखते हुए सेक्स को खुला कर दिया नहीं तो पहले वहाँ भी सेक्स खुला नहीं था।

अब देखिए इसी बदचलनी और बेशर्मी को नाम मिला खुलापन का और भारत में लोग इसे शान समझकर अपनाने लगे।क्यों भाई ??पहले जो हमारी माता सीता जैसी औरतें साड़ी पहनती थी या शर्म का आभूषण धारण करती थी क्या वो इसलिए कि उनका दिमाग गंदा था????और अब जो खुलेपन के नाम पर लड़कियां अपना देह खोलने लगी और लाज-शर्म को भूल गई तो इसलिए कि इनका दिमाग शुद्ध है और इनके विचार पवित्र हैं????

बराबरी की बात तभी की जाती है जब छोटे और बड़े की बात आती है।भारत की महान संस्कृति में नारी पुरुष के बराबर थी या इससे ज्यादा ही महान थी लेकिन कम नहीं थी कभी।इसलिए यहाँ कभी बराबरी की बात नहीं की गई।परंतु विदेशों में लड़कियों को लड़कों से कम महत्व दिया जाता था इस कारण लड़कियों ने लड़के की बराबरी करने के लिए अपना पारंपरिक लड़कियों वाला पोशाक उतार फेंका और लड़कों के पोशाक जींस-पैंट को पहनकर अपने आपको लड़के के बराबर बन जाने का दिलासा देने लगी।हरेक काम लड़कों की तरह करने लगी जैसे नौकरी करना,सिगरेट पीना,दारू पीना आदि सब काम।क्या लड़कों की बराबरी करने के लिए लड़कियों को लड़कों वाले ही काम करना जरूरी है???जो भी हो भारत की लड़कियों ने भी इसे अपना आदर्श बनाया और जींस-गंजी,फूलपैंट -शर्ट(ये कम था तो ऊपर से टाई भी)पहनकर अपने आपको लड़का समझने लगी।इससे भी इनकी हीन भावना नहीं मिटी तो दारू-सिगरेट तथा अन्य खतरनाक नशीले पदार्थों का सेवन करने लगी ये।मैं अपनी कक्षा के ही ऐसी कई लड़कियों को जानता हूँ जिसे मैं काफी सीधी समझता था पर ऐसे-ऐसे चीज प्रयोग करती है जिसका नाम भी मैंने पहले कभी नहीं सुना था और ना ही बाद में वो नाम याद ही रहा मुझे।

जो इस भ्रम में पड़े हुए हैं कि विदेशों में लोग नारियों को पुरुषों के बराबर समझते हैं उन्हें मैं बता दूँ कि वहाँ स्थिति भारत से भी बुरी है।इसका सबसे बड़ा उदाहरण है वहाँ लड़कियों को इंसान ना समझकर उपभोग की वस्तु समझना।जो देश "Miss World" और मिस यूनिवर्स जैसी प्रतियोगिता करवाता हो उस देश की मानसिकता आसानी से समझी जा सकता है कि क्या औकात है वहाँ लड़कियों की।इस शर्मनाक और घृणित प्रतियोगिता को भी खुलापान और बड़ा सोच बताया जाता है।

पर हाय रे मेरे देश का दुर्भाग्य कि मेरे देश के पिताओं ने भी अपनी बेटियों को इन प्रतियोगिताओं में भेजना अपना शान समझ लिया।और लड़कियां तो बचपन से ही विश्व-सुंदरियों को अपना आदर्श बना बैठती है॥वैसे इसमें बच्चों का कोई दोष नहीं वे तो अनजान होते हैं पर माता-पिता को तो समझाना चाहिए ना और बहुत से माता-पिता भी नहीं जानते हैं इन प्रतियोगिताओं की सच्चाई को पर हमारे सरकार को तो समझाना चाहिए ना!

चलिए लड़कियों की बात छोड़िए।ये तो बेचारी हैं दया के पात्र हैं।लड़कों की बात करते हैं। जिन लोगों का पेट बाहर की ओर निकला होता है उस बेचारे की मजबूरी होती है कि उन्हे जिंस कमर के काफी नीचे से पहनना पड़ता है पर जो स्वस्थ लड़के हैं उन्हें इस बात में क्या फैशन दिखा कि जिंस को नीचे सरकाने की होड़ सी लग गई।आजकल युवाओं की सोच ऐसी हो गई है कि भले ही वो कितने भी गंदे दिखें पर जिंस,पैंट और स्कर्ट को यथासंभव नीचे तक खिसका ही पहनेंगे।क्यों?फैशन है।या फिर ये दिखाना है कि

"Jockey"का जाँघिया पहना है या "Macroman" का?पर जाँघिया दिखाने के लिए भी जींस को थोड़ा सा नीचे करने से काम चल जाएगा पर ये जींस को नीचे से नीचे पहनने की प्रतियोगिता किस बात की?

विदेशी लोगों में सुंदर दिखने का जुनून सवार है जिसकारण लड़के अपना नाक,कान,भौंहे,गाल,होंठ,छाती और पता नहीं

क्या-क्या;सुना है लड़कियां तो अपना नाभी और गुप्तांग में भी बाली पहनती है।हम भारतीयों को इसमें क्या दिखा कि हमने भी इस प्रकृति-प्रदत्त सुंदर शरीर को जहां तहां कील-ठोककर बिगाड़ना शुरू कर दिया।

विदेशियों को भगवान ने काला रंग का बाल का सौभाग्य नहीं दिया है।उनके बाल भूरे या सफेद होते हैं पर हम भारतीयों को क्या फैशन दिखा इसमें कि अपने काले सुंदर बाल को भूरे,सफेद,लाल,पीला रंग से रंगने में खुशी मिलने लगी!!

वहाँ की जलवायु ठंडी है तो वो गरम चाय या काफी पीते हैं पर हम गर्मी में भी क्यों दस-बारह कप डकार जाते हैं।

उनके पास पैसा बहुत ज्यादा है तो उस पैसे को खत्म करने के लिए अनाज और फल को सड़ाकर शराब बनाकर पीते हैं और पैसे को खत्म करते हैं।पर हम क्यों???

कितनी हंसी की बात है कि देशी शराब से तो घृणा करते हैं हम भारतीय पर विदेशी शराब के नाम पर बीयर,वोदका,रम,ह्वीस्की आदि पीना अपनी शान समझते हैं।

भारतीय खाना कितना भी सस्ता,स्वादिष्ट और स्वास्थ्यकर हो पर स्वाद तो हमें स्वास्थ्य के लिए हानिकर पिज्जा और बर्गर में ही मिलता है।इसलिए कि पिज्जा मंहगा है और विदेशी भी तो इसे खाकर हमें विदेशियों जैसे आधुनिक,सभ्य और अमीर होने का सुखद एहसास होता है।साथ-ही साथ अगर हमारे किसी पड़ोसी या दोस्त को पता चलता है कि हम पिज्जा खाते हैं तो उस पर हमारा प्रभाव भी जम जाता है।

योग भले ही कितना भी लाभदायक हो पर खुशी तो हमें शरीर को बर्बाद करने वाले जिम को करके ही मिलती है।

भारतीय संगीत कितना भी मधुर हो पर रस तो हमें बेतुके और बेसुरे विदेशी संगीत में ही मिलता है।भारतीय संगीत कितना भी शांति और सुकून देने वाला क्यों ना हो शांति तो हमें शोर-शराबे वाले विदेशी धुनों को सुनकर ही मिलती है।

अन्य फ्लेवर कितना भी स्वादिष्ट क्यों ना हो स्वाद तो हमें चॉक्लेट फ्लेवर में ही मिलता है।चॉक्लेट होरलिक्स,दूध,बिस्कुट आदि-आदि।

मुझे याद है जब पहली बार बड़े शौक से मैंने किट-कैट का चॉक्लेट खरीदा था।मंहगा था इसलिए बहुत खुशी से उसे खाना शुरू किया।पर पहले कौर से ही ऐसा लगा कि साला ई बच्चों का चॉकलेट है या दवाई है।याद नहीं मुझे मैं वो पूरा खा भी पाया था या नहीं।पर आज जब लोगों में इसके लिए इतना दीवानापन देखता हूँ तो यही सोचता हूँ कि विदेश के नाम पर कुछ भी पसंद कर लेंगे हम भारतीय।50 पैसे का दूध-मक्खन के स्वाद वाला "maha-Lacto" कितना भी स्वादिष्ट क्यों ना हो और kiT-KaT कितना तीता ही क्यों ना हो पर खाएँगे तो किट-कैट ही।क्योंकि ये मंहगा है और साथ ही साथ विदेशी भी।

जिस टाई को विदेशी अपनी नाक पोछने के लिए बांधते थे उस टाई को बांधना हमने अपनी शान समझ लिया।विदेशों में तो सर्दी है लोगों की नाक बहती रहती है पर हमारे यहाँ तो गर्मी है.....!

विदेशी हमारी तरह रोटी-सब्जी या दाल-भात नहीं खाते हैं तो वे हाथ के बजाय कांटे-छूरी या चम्मच का प्रयोग करते हैं पर हम क्यों??चम्मच और कटोरी का मेल है।चूंकि कटोरी में खीर-सेवई जैसे तरल पदार्थ खाए जाते हैं तो चम्मच जरूरी है पर रोटी और सब्जी में चम्मच क्यों?हमारा हाल तो ऐसा हो गया है कि हम एक हाथ से रोटी खा भी नहीं पाते।रोटी तोड़ने के लिए हमें दोनों हाथ लगाने पड़ते हैं।चूंकि दाएँ हाथ में तो चम्मच होता है इसलिए बाएँ हाथ से ही रोटी का निवाला मुंह में डालते जाते है।चूंकि हाथ तो ज्यादा गंदा होता नहीं है इसलिए खाने के बाद हाथ धोने की बजाय बस हाथ झाड़कर काम चला लेते हैं हम।जो चम्मच की बजाय हाथ से खाना खाते हैं वो हमसे ज्यादा शुद्धता बरतते हैं क्योंकि खाने के बाद कम-से-कम वो हाथ तो धोते हैं पर फिर भी अगर हम अपने सामने किसी को हाथ से खाते देख लेते हैं तो हमें घिन आने लगती है कि कितना असभ्य और घिनौना है ये व्यक्ति जो चम्मच की बजाय हाथ गंदा कर रहा है।जो चीज हम मुंह में डालते हैं वही चीज किसी के हाथ में सट जाती है तो हमें घिन आने लगती है।आखिर हम सभ्य,आधुनिक और अंग्रेज़ के वफादार जो हैं और ये तो हाथ से खाने वाले साले असभ्य और गरीब भारतीय!

हम भले ही हाथ से दाल-भात खाने में भी असमर्थ हों पर हम फिर भी सभ्य है।आखिर अंग्रेज़ होने का मुहर जो लग गया हमपर!

अंग्रेजों को पानी की कमी होगी या ठण्ड के कारण हाथ भिंगोना नहीं चाहते होंगे तो वे पानी की बजाय कागज का प्रयोग करते हैं पर हमें तो ईश्वर ने गर्मी और प्रचुर पानी दिया है फिर हम क्यों इतने गंदे बन रहे हैं।खाने के बाद तो हाथ धोने की बात छोड़िए क्यों हम शौच के समय भी पानी के बजाय कागज से पोछने जैसा अत्यंत घिनौना काम करते हैं।??

अंग्रेज़ तो चाहेंगे ही कि हम भी उनकी तरह बन जाएँ।आज जितने भी बड़े-बड़े विदेशी पिज्जा-हट,मैक-डोनाल्ड,कैफे-टाइम जैसे food-corner हैं जिसने उस दूकान में करोड़ों की पूंजी लगाई है जहां मंहगे-मंहगे कुर्सी-टेबल,सोफे आदि तो होते हैं पर हाथ धोने के लिए एक बेसिन तक नहीं होता।किस बात की ओर संकेत करता है ये।?

परिस्थिति ऐसी हो चुकी है कि कल को अगर किसी बीमारी से सारे अंग्रेज़ टकले होने लगें तो भारतीय भी फैशन के नाम पर अपने-अपने सर के बाल मूडवाना शुरू कर देंगे।किसी कारण वश अगर वे लोग अपाहिज हो जाएँ और लाठी लेकर चलना उनकी मजबूरी हो जाय तो हम भी लाठी लेकर चलना अपनी शान समझने लगेंगे।अगर किसी दिन उन्हें कुत्ते का मूत्र भा जाए और वे पीना शुरू कर दे तो हमारे यहाँ भी कुत्ते का मूत मंहगी बोतलों में बिकना शुरू हो जाएगा और शान से हम कुतर-मूत्र की पार्टी भी मनाने लगेंगे॥

क्षमा चाहता हूँ एक और कड़वा सत्य कहने के लिए पर परिस्थिति ऐसी ही है कि कल को अगर अंग्रेजों को कुतिया भा गई और उसके साथ वो शादी करने लगे तो हमारे यहाँ भी कुतियों के साथ शादी करने की प्रथा शुरू हो जाएगी जिस प्रकार विदेशों में गे और लेस्बियन का चलन बढ़ा तो यहाँ भी लोगों ने शुरू कर दिया।वहाँ तो लड़कियां लड़का बन चुकी है तो लड़के की रुचि लड़कियों से हट गई पर भारत में ऐसा क्यों??

क्या अंग्रेज़ बन जाना ही आधुनिक और सभ्य बनना होता है??मैं ये नहीं कहता कि विदेशी से नफरत करो।जो चीज उनकी अच्छी है वो जरूर अपनाओ पर बिना सोचे-समझे उनकी बुरी चीजें तो मत अपनाओ और अपनी अच्छी चीजों पर उनके बुरे चीजों को ज्यादा महत्व तो ना दो।

भारतियों के लिए एक कहावत है कि हमेशा हमें दूसरों की बीबी पसंद आती है पर इसका मतलब ये तो नहीं ना कि हमारी बीबी अगर मेनका है और दूसरे की शूर्पनखा फिर भी हमें अपनी मेनका के बजाय शूर्पनखा ही पसंद आए।आखिर किसी चीज की हद होती है यार।विदेशी चीजें आकर्षित कर सकती हैं पर इसका मतलब ये तो नहीं ना कि उनके मल-मूत्र भी हम पसंद करने लगें।

आज विवेकानंद जी का जन्मदिन का शुभदिन है।युवाओं से मैं यही कहूँगा कि याद कीजिए उनके आदर्शों को।प्रेरणा लीजिए उनसे और गर्व करिए अपने भारतीय होने पर।हम भारतीय वो हैं जिसने पूरी दुनिया को पैंट पहनना और शुशु करना सिखाया है।हम भारतीय तो विश्वगुरु थे चेले-चटिए नहीं।हम चक्रव्रती सम्राट थे किसी के दास नहीं।याद कीजिए भीष्म जैसे हमारे महान पूर्वजों को और आजाद करिए अपने आपको विदेशियों की मानसिक गुलामी से।जो व्यक्ति अपना आत्मविश्वास और आत्मस्वाभिमान खो देता है वो बस एक गुलाम बनकर रह जाता है।ऐसा व्यक्ति कभी अपना विकास नहीं कर सकता।जगाना होगा हम भारतियों को अपना आत्मविश्वास क्योंकि हमें हमारे भारत माँ के खोए हुए सम्मान को फिर से वापस लाना है।हमारी रगों में जो हमारे महान पूर्वजों का खून दौड़ रहा है उसे लज्जित नहीं करना है हमें।हमें दिखा देना है अपने पूर्वजों को कि हम भी उन्हीं की महान संतान हैं जिनके चरणों में सारी दुनिया श्रद्धा से अपना सर झुकाती है।

10 टिप्‍पणियां:

  1. sahi kaha aapne hamre desh washi bhed chal chal rahe hai samjhana bahut muskil hai magar namumkin nahi lage rahiye der saver samjh aayegi hi

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  2. आपके विचारो जैसे युवाओ की आवश्यकता है इस देश को

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  3. जाग्रति बढाने वाला आलेख

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  4. बेहतरीन लीखा है आपने

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  5. यह विश्वास करना कठिन है कि ऐसा जानबूझकर किया जा रहा है, लेकिन यह सही है कि नैतिक मूल्य गिराने वाले तथा भारतीय अस्मिता को चोट पहुंचाने वाले कारनामों का सिलसिला बढ़ता जा रहा है।
    आपके विचारो जैसे युवाओ की इस देश को आवश्यकता है
    आपकी जितनी तारीफ़ की जाय कम है ।
    सिलसिला जारी रखें ।
    आपको पुनः बधाई ।

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  6. अन्तिम अनुच्छेद छोड़कर सब कुछ शानदार लगा।

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  7. अबे ये माता सीता जी का नाम गलत जगह लिखा है. हर जगह भगवान् जी के नाम का उदाहरण देना जरुरी नहीं होता बे. क्या बकवास है.. ...

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  8. Apka lekh Jo parhega asha karunga ki uski mansikta pr kuch parivartan ayega.per aap large rahiyega. Jai hind

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