मंगलवार, 6 जनवरी 2015

जब पूरा विश्व दीवाना था भारतीय कपड़ों का.....

क्या आपको पता है कि अठारहवीं शताब्दी तक जब तक कि यूरोप में औद्योगिक क्रांति नहीं आई थी तब तक यूरोप,  अरब, चीन सहित पूरे विश्व को कपडे हम भारतीय ही पहनाया करते थे.यूरोप में तो बाद में सभ्यता आई पर मिश्र जो भारत की समकालीन है उसे भी हमने ही कपडे पहनाये हैं.वहाँ पाए जाने वाले ममी में भारतीय मलमल के टुकड़े प्राप्त हुए हैं.ऐसा इसलिए कि सबसे पहले कपास की खेती हमने ही शुरू की थी और वस्त्र उद्योग में महारत हासिल कर ली थी हमने.पूरा विश्व भारतीय कपड़ों का दीवाना था.विदेशी भारतीय कपड़ों को पहनकर गर्व महसूस करते थे.और चूंकि वहाँ के राजे-महाराजे भारतीय कपडे पहना करते थे इसलिए आम लोगों की नजर में भारतीय पोशाकों की एक अलग इज्जत थी.इन सबके बावजूद एक बार ब्रिटेन के राजघराने में भारतीय कपड़ों पर रोक लगा दी गई थी.जानते हैं क्यों? क्योंकि उस समय भारत ने औरतों के लिए कमर के नीचे पहनने वाला एक ऐसा पोशाक तैयार किया था जो पारदर्शी था.जाहिर सी बात है कि इस तरह का पोशाक भारतीयों ने सिर्फ अंग्रेजों के लिए तो नहीं ही बनाया होगा बल्कि वो पोशाक खुद भारतीय भी पहनते होंगे.
ये सब बहुत पुरानी बाते क्यों बता रहा हूँ मैं??इसलिए कि आज जब मैं अपने भारत में लोगों की पश्चिमी कपड़ों के प्रति दीवानगी देखता हूँ तो दुःख होता है .आज तन दिखने वाले कपडे पहनना आधुनिकता का पर्याय माना जाता है जबकि पूरे कपडे पहनना पिछड़ेपन का.अगर तन दिखने वाला कपड़ा पहनना ही आधुनिकता है तो वो तो हम अठारहवीं शताब्दी में ही कर चुके हैं,तो इस हिसाब से भी भारतीय पिछड़े हुए कहाँ हैं.
आज आधुनिकता को नंगापनी और सेक्स से मापा जाता है.अगर सेक्स पर खुलेआम चर्चा करने को ही आधुनिकता का आधार बनाया जाय फिर भी हम विश्व से बहुत आगे हैं.विश्व की पहली सेक्स पर लिखी गई पुस्तक कामसूत्र है जो महर्षि वात्सयायन ने लिखी थी और ये उन्नीसवीं सदी में यूरोप पहुँची.और आपको आश्चर्य होगा कि आप जिस ब्रिटेन को इतना खुला मानसिकता वाला समझते हैं वहाँ इस पुस्तक ने कोहराम मचा दिया.काफी विवाद हुआ था इस पर तब जाके इस पुस्तक को स्थान दिया गया उस देश में.
इसके अलावे अगर नग्न होना या खुले में सेक्स करना ही आधुनिकता है तो जाकर खजुराहो में देख लीजिये.हमने तो आज से हजारों साल पहले सातवीं सदी में ही सेक्स करते हुए लोगों की नग्न मूर्तियाँ बना दी है.और ऐसी हिम्मत तो शायद अभी भी कोई पश्चिमी देश न कर पायें.
जिस समय हम अंतरिक्ष के गोलों के साथ खेल रहे थे उस समय पूरा विश्व गुल्ली-डंडे खेल रहा था.जिस समय हम यज्य में अन्न की आहुति दे रहे थे उस समय पश्चिमी देश अन्न के एक-एक दाने के लिए तरस रहा था.इतनी विकसित सभ्यता रही है हमारी .फिर क्यों आज हम खुद पर भरोसा करने के बजाय पश्चिमी देशों के पीछे भाग रहे हैं???
ये लेख मैंने उनलोगों के लिए लिखा है जो यह समझते हैं कि भारत हमेशा से पिछड़ा हुआ देश रहा है और विदेशी हमेशा से विकसित रहे हैं.और मुझे दुःख भी है कि भारत को प्राचीन काल में विकसित देश साबित करने के लिए मुझे कपडे और  सेक्स का सहारा लेना पड़ा.पर ये मेरी मजबूरी है क्योंकि अभी के युवा बस इसी की भाषा समझ रहे है.अगर मैं ये कहूंगा कि आज से हजारों साल पहले भारत में प्लास्टिक-सर्जरी हुआ करती थी तो लोग विश्वास नहीं करेंगे और हँसेंगे मुझपर.कुछ दिन पहले जब विज्ञान कांग्रेस में यह भाषण दिया जाने वाला था कि प्राचीन भारतीयों को विमान बनाने की तकनीक पता थी तो लोग हंस रहे थे और मजाक बना रहे थे..
प्राचीन काल में भारत अगर खरगोश था तो पूरा विश्व कछुआ था लेकिन घमंड में चूर भारत सो गया और कछुआ खरगोश से बहुत आगे निकल गया.आवश्यकता इस बात की है कि हम खुद को पहचाने.अपने आप पर भरोसा करें और पश्चिमी देशों के पदचिह्नों पर चलने की बजाय हम अपना रास्ता खुद बनायें.

सोमवार, 5 जनवरी 2015

मूर्ति-पूजा अगर अंधविश्वास है तो ये अंधविश्वास भी बहुत जरूरी है


सिर्फ मूर्ति-पूजा के कारण ही भारत में कई कलाओं का विकास हुआ है.मूर्ति-पूजा के कारण ही शिल्पकारी की कला का विकास हुआ,उसके बाद मूर्ति को स्थापित करने के लिए बड़े-बड़े भव्य मंदिरों का निर्माण होना शुरू हुआ  जिसके कारण भारतीय स्थापत्य कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई जिसके कारण आज जब हमारे अतीत पर ज्ञान-विज्ञान में पिछड़ेपन का आरोप लगाकर हमें अपमानित करने का प्रयास किया जाता है तो ये भव्य मंदिर ही हैं जो हमारे विरोधियों को मुंहतोड़ जवाब देती है और कहती है कि देखो मेरी इन ऊँची-ऊँची शिखरों को जो हमारी प्राच्य-विज्ञान की ऊंचाई का प्रमाण है.कई सालों के लगातार बर्बर,असभ्य विदेशी आक्रमणों ने जान-बूझकर भारत के सारे ज्ञान-विज्ञान को नष्ट कर दिए.उन्होंने सोमनाथ मंदिर,जो उस समय के लोगों के लिए आभियांत्रिकी की अबूझ पहेली थी,उसके जैसे अनगिनत मंदिरों को नष्ट कर दिया पर फिर भी समय की लहरों के इतने सारे थपेड़े के बावजूद आज भी बृहदेश्वर और कोणार्क के सूर्यमंदिर जैसे कई मंदिर विदेशियों को उसकी औकात बता रहे हैं.इन्हीं मंदिरों की छत्र-छाया में कई कलाओं का विकास हुआ जिसमें से एक भरतनाट्यम भी है जिसका विकास शरीर के विभिन्न भाव-भंगिमाओं के द्वारा  भगवान् को प्रसन्न करने के लिए किया गया था.
मूर्ति-पूजा का सम्बन्ध धर्म से है और धर्म का सम्बन्ध आस्था से.आप इन्हें अंधविश्वास समझिये या डर या लोगों का भगवान् के प्रति विश्वास और प्रेम या लोगों की आवश्यकता या विवशता,जो भी हो  पर ये मानव जीवन के लिए बहुत ही आवश्यक हैं
आप समझ सकते हैं कि ये धर्म,जिसे आजकल अपने आपको बहुत ही ज्यादा समझदार समझने वाले लोग डर और अंधविश्वास का नाम दे रहे हैं,इस एक धर्म ने ही लोगों को कितनी सारी कलाओं के विकास के लिए प्रेरित किया है.हो सकता है कि कुछ लोगों के लिए ये धर्म,भगवान्,आस्था,मूर्ति-पूजा आदि अंधविश्वास हो पर ये अन्धविश्वास मानव के बहुत जरुरी है क्योंकि ये अंधविश्वास ही मानव को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है,उसे अच्छे काम के लिए प्रोत्साहित करती है और बुरे काम के लिए हतोत्साहित.धर्म ही है जो लोगों को एकजुट करती है,एक-दूसरे का सहयोग करने के लिए प्रोत्साहित और मजबूर भी करती है.क्योंकि बहुत सारे व्रत ऐसे होते हैं जिन्हें संपन्न करने के लिए आपसी सहयोग आवश्यक होता है.
इसके अलावे हमारे जीवन में खुशियाँ भरने वाले बहुत से त्योहार मूर्ति-पूजा से ही जुड़े हुए है.चाहे वो सरस्वती-पूजा हो जिसके उपलक्ष्य में स्कूल में बहुत तरह के कार्यक्रम होते हैं या फिर दशहरा का दुर्गा माँ की पूजा जिसमें लगने वाले  मेले का हमलोग साल भर प्रतिक्षा करते रहते हैं.
जगन्नाथ रथ यात्रा जैसे भव्य महोत्सव  और दशहरा का त्योहार जिसमें देश भर में जगह जगह मेले लगते हैं,इनका आधार  मूर्ति पूजा ही है .इन मेलों का ग्रामीण जीवन में बहुत महत्व है क्योंकि गाँव के लोगों की कई जरूरतें इन्हीं से पूरी होती है.ये गाँव की अर्थव्यवस्था को गतिमान बनाये रखने के लिए आवश्यक होते हैं.इसके अलावे मेला देखने के बहाने लोग अपने सगे-सम्बन्धियों और परिचितों से मिल भी लेते हैं.
कुछ ना कुछ बुराइयाँ तो हर अच्छी चीजों के साथ जुडी ही होती है.धर्म या मूर्ति -पूजा के भी नकारात्मक पहलू हैं जिसे आज हिन्दू-विरोधी लोग प्रचारित करने में लगे हुए हैं पर जिस प्रकार भोजन हमें जीवन देती है और विषाक्त होने पर वो जीवन हर भी लेती है तो जरुरत भोजन को विषाक्त होने से बचाने की है न कि भोजन को त्यागने की,उसी प्रकार धर्म को त्यागने की नहीं बल्कि उसे दूषित होने से बचाकर जीवनोपयोगी बनाने की आवश्यकता है.

रविवार, 28 दिसंबर 2014

मूर्ति-पूजा क्यों?

हिन्दू-विरोधी प्रश्न करते हैं कि भगवान तो अनंत हैं जिसका न आदि है ना अंत तो फिर उसे एक निश्चित आकार में बांधकर मूर्ति-पूजा क्यों?
उत्तर है कि जिस प्रकार प्यास को बुझाने के लिए पूरे समुद्र को घर में नहीं लाया जाता है बल्कि एक घड़ा पानी ही पर्याप्त होता है,उसी प्रकार हमारे लिए तो भगवान् की एक छोटी से मूर्ति ही पर्याप्त है.
OMG,P.K जैसे फिल्मों के माध्यम से यह प्रचारित किया जा रहा है कि मूर्ति-पूजा गलत है,शिवलिंग पर दूध चढ़ाना गलत है आदि-आदि.
कुछ तथ्य मैं यहाँ पर रख रहा हूँ.आपलोग स्वंय निर्णय कीजिये कि हिन्दू-धर्म में प्रचलित इन रीति-रिवाजों की आलोचना कहाँ तक उचित है.
सबसे ज्यादा कटाक्ष किया जाता है शिवलिंग पर दूध चढाने को लेकर.इसके लिए मैं एक बहुत छोटे और गरीब गाँव का उदहारण दे रहा हूँ.झारखण्ड के गोड्डा जिले में एक गाँव है धमसाय.इस गाँव में एक शिव मंदिर है.इस गाँव से करीब ५०-६० किलोमीटर दूर तक क्षेत्र में जब किसी के घर में गाय या भैंस दूध देना शुरू करती है तो लोग पहला दूध इस मंदिर में भगवान् शिव को अर्पण करते है.बहुत दूर-दूर से लोगों के आने के कारण यहाँ काफी मात्रा में दूध चढ़ाया जाता है परन्तु यहाँ एक बूँद भी दूध बर्बाद नहीं होता. पीतल की बनी हुई एक नलिका से दिन भर का सारा दूध एक बड़े से पात्र में एकत्रित कर लिया जाता है और रात में खीर बनाकर पूरे गाँव में बाँट दिया है.
ये तो एक छोटे से गाँव में हो रहा है जहाँ मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है तो ज़रा सोचिये कि बड़े-बड़े मंदिरों में जहाँ ढेर सारा दूध चढ़ाया जाता है वहाँ अगर सारा दूध एकत्रित कर लिया जाय और उस दूध को प्रसाद के रूप में गरीबों को पिला दिया जाय या खोवा ,मिठाई आदि बनाकर प्रसाद के रूप में बाँट दिया जाय तो जो लोग आज हमारी बुराई कर रहे हैं वही हमारी प्रशंसा करेंगे.
आज आवश्यकता ये है कि हिन्दू रीति-रिवाजों में थोड़ा बदलाव करके उसे अच्छा बनाएं ना कि उसका विरोध करें.अब सोचिये अगर शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ सारा दूध इकठ्ठा कर लिया जाय तो कितने ही गरीबो का पेट भरा जा सकता है पर लोगों को दूध चढ़ाने से ही मना कर दिया जाएगा तो कितने लोग गरीबों को दूध पिलाने के लिए आयेंगे. ?
शिवलिंग पर दूध चढाने से या किसी मूर्ति के सामने फूल-मिठाई अर्पण करने से हम भगवान् के साथ एक जुड़ाव महसूस करते हैं.अगर भगवान् की मूर्ति हमारे सामने ना हो तो ऐसा लगता है जैसे भगवान् हमसे बहूत दूर हैं,वो इस दुनिया में नहीं बल्कि किसी और दुनिया में रहते हैं परन्तु मूर्ति के माध्यम से हम यह एहसास करते रहते हैं वो हर पल हमारे साथ हैं और ये एहसास कि भगवान् हमेशा हमारे साथ हैं बहुत बड़ी चीज है क्योंकि ये एहसास ही हमें कोई गलत काम करने से रोकती है और अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करती है.ये एहसास ही है जो कठिन परिस्थितियों में भी हमें धैर्य धारण करने की शक्ति देती है,जब हम अपने आपको बिलकुल असमर्थ और असहाय महसूस करते हैं तो ये एहसास ही हमारा सहारा बनती है,जब हम खुद को शक्तिहीन और उर्जाहीन महसूस करने लगते हैं तो भगवान् के साथ ये जुडाव ही हमें ऊर्जा देती है क्योंकि सारी ऊर्जा का स्रोत तो ईश्वर ही हैं.जब हम प्रेम से भगवान् की मूर्ति को नहलाते-धुलाते हैं,उन्हें कपड़ा पहनाते हैं,उन्हें खाना खिलाते हैं तो हमारे दिल में प्रेम का भाव जगता है जो हरेक जीवों से प्रेम करने को प्रेरित करता है.
भगवान् के लिए अपने ह्रदय में प्रेम बढ़ाने के लिए ही हम मंदिर जाते हैं,भगवान् की कथा सुनते हैं,उनके नाम का संस्मरण करते हैं,भजन-कीर्त्तन करते हैं,उपवास करते हैं,कष्ट सहकर नंगे पाँव चलकर उनके मंदिर जाते हैं क्योंकि कष्ट सहने से हमारी सहनशक्ति बढ़ती है और भगवान् के लिए प्रेम भी.

कहने का तात्पर्य यही है कि भगवान् को फूल चढाने से,दूध पिलाने से या उनके लिए उपवास रखने से भगवान् को कोई फर्क पड़े या न पड़े पर हम पर जरुर फर्क पड़ता है क्योंकि इन सब रीति-रिवाजों को निभाने से हमारे अन्दर अच्छाईयाँ आती है...इसलिए आज आवश्यकता इन परम्पराओं को ख़त्म करने की नहीं है बल्कि इन परम्पराओं की महत्ता को लोगों को समझाने की है.पहले तो लोगों से सिर्फ धर्म के नाम पर ये सब परम्पराएं निभवा लिए जाते थे पर अब जरुरत है कि लोगों को तर्क के साथ समझाया जाय.जैसे घर में तुलसी का पौधा लगाना या सब्जी में हल्दी डालना पहले धर्म या परंपरा के नाम करवाया जाता था जबकि अब इन सब के लिए वैज्ञानिक कारण समझाना पड़ता है.

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

आखिर क्यों नहीं अपनाती है इन समलैंगिकों को ये सभ्य समाज?


क्या अधिकार है इस सभ्य समाज को इनसे घृणा करने का जबकि ये इन्हीं की देन है?आखिर इस फसल का बीज इसी सभ्य समाज ने तो बोया है और बोना जारी भी रखा है।बीज बोते समय तो बहुत खुश होते हैं,पेड़ ज्यों-ज्यों बड़ा होता रहता है उसे देखकर उतना ही खुश होते रहते हैं पर जब फल आते हैं तो विश्वास नहीं कर पाते कि ये फल उसी बीज का है।
हा.......कितने हंसी की बात है कि अपने ही जिस पौध को इतने प्यार से सींच रहे थे उसी के फल से इतनी घृणा!!!

घर में बच्ची ने जन्म लिया नहीं कि उसे लड़कों जैसा डॉक्टर,इंजीनियर,आई॰ए॰एस॰,आई॰पी॰एस॰,बनाने के सपने देखने शुरू कर देते हैं।उसे बेटी के बजाय बेटा-बेटा कहकर पुकारने में आनंद प्राप्त करते हैं।बचपन से ही उसके मन में यह बात डालना शुरू कर देते हैं कि उसे लड़कों जैसा बनना है।बच्ची को एहसास हो जाता है कि लड़की का महत्त्व लड़कों से कम होता है इसलिए वो भी अपना सब कुछ झोंक देती है लड़का बनने के लिए।अपना पहनावा-ओढ़ावा,आचरण,अपने विचार सब कुछ लड़कों जैसे बनाने में लग जाती है वो।चाहे लड़कों जैसे बाईक चलाना हो या फिर नशीली पदार्थों का सेवन करना हो या लड़कों जैसा बेशर्मी करना हो।लड़कों की हर चीज को कॉपी करना शुरू कर देती है वो और जवान होते-होते सिर्फ आचरण से ही नहीं बल्कि मन से भी वो लड़का बन जाती है।मन का असर तन पर पड़ना स्वाभाविक ही है।पूरे शरीर को और शरीर के अंदर के हार्मोन्स को मन ही तो नियंत्रित करता है... अब जब वो लड़का बन चुकी है तो भला उसे लड़कों में रुचि क्यों होगी..??स्वाभाविक सी बात है कि किसी लड़के के बजाय अब उसे अपने व्यवहार के विपरीत शर्मीली,मासूम सी कोई लड़की ही पसंद आएगी॥तो इसमें उस बेचारी का क्या दोष!!मैं तो नहीं मानता हूँ कि उसका कोई दोष है।

यह समाज भले उसे ना अपनाए पर कोई हक नहीं बनता इस सभ्य समाज को उसे भला-बुरा कहने का क्योंकि जो कुछ भी हुआ इसमें नुकसान तो उस लड़की का ही हुआ जिसका जिम्मेदार यही सभ्य समाज है वो समलैंगिक बन चुकी लड़की नहीं।।
ये तो थी स्त्री समलैंगिकता की बात।अब जहां तक पुरुष समलैंगिकता की बात है तो इन्होंने तो समाज का इतना उपकार किया है कि समाज को फूलों की माला लेकर इनका स्वागत करना चाहिए।लेकिन यह विडम्बना ही है कि इसके विपरीत इन्हें समाज से तिरस्कार ही मिलता है।
जो समाज लड़की को अपने सर का बहुत भारी बोझ समझता है और बेचारी को जन्म लेने से पहले ही मार डालता है जिसमें कोई-कोई व्यक्ति तो लगातार 4-5(या ज्यादा ही) बच्चियों तक की हत्या कर डालने में भी संकोच नहीं करता है तो ऐसे लोगों पर तो बहुत बड़ा उपकार किया है इन पुरुष समलैंगिकों ने।कम-से-कम इस तरह के लोगों को तो कोई हक नहीं बनता है समलैंगिकों को देखकर नाक सिकोड़ने का।जिस समाज में लड़का-लड़की के अनुपात में इतनी ज्यादा असामानता है उस समाज के लिए तो पुरुष समलैंगिकता एक वरदान की तरह ही है।हाँ,,ऐसी स्थिति में जब लड़के की तुलना में लड़कियों का अनुपात इतना कम हो तो स्त्री समलैंगिकता भले ही अभिशाप हो सकती है समाज के लिए।
एक और महत्त्वपूर्ण बात कि भ्रूण-हत्या करने वाले को तो अधिकार नहीं ही है पुरुष समलैंगिकों से नफरत करने का पर इसके साथ-साथ उनलोगों को भी अधिकार नहीं है जो अपनी बेटी के बेटी होने पर गर्व नहीं कर सकते और उन्हें बेटा बनाने पर तुले होते हैं क्योंकि धारा के प्रवाह के लिए दो विपरीत ध्रुवों का होना आवश्यक है और इसलिए आपने जब लड़कियों को अपना ध्रुव बदलने पर विवश कर दिया तो धारा के प्रवाह के लिए तो लड़कों को भी तो अपना ध्रुव बदलना ही पड़ेगा ना??तो इस प्रकार ये भी तो इस सभ्य समाज पर पुरुष-समलैंगिकों का एक प्रकार का उपकार ही हुआ ना...?
लड़कों के मन को अपनी कठोर प्रकृति के विपरीत कोमल-नाजुक,सभ्य,सुशील,संस्कारी एक सीधी-साधी प्यारी सी लड़की आकर्षित करती है।जब लड़कियाँ लड़का बनने के प्रयास में यह सब अपना स्वाभाविक-प्राकृतिक गुण खो चुकी है तो भला लड़के कैसे आकर्षित होंगे इनके प्रति और कैसे शादी करेंगे,क्यों एक लड़का लड़कों जैसे ही गुण रखने वाली किसी लड़की से शादी करे।अगर उसने लड़की के गुण रखने वाले किसी लड़के से शादी कर ली तो इसमें आपका क्या गया और आप कौन होते हैं उसे बुरा भला कहने वाले क्योंकि आपने तो कुछ नहीं खोया बल्कि आपने तो पाया- संतान के रूप में लड़की के बदले लड़के को जबकि इनलोगों ने तो बस खोया ही खोया पाया कुछ भी नहीं..
इस समाज को तो उन लड़कों को धन्यवाद देना चाहिए जिन्होंने लड़का होकर अपने अंदर लड़की वाले गुण विकसित कर लिए क्योंकि ये समाज के सच्चे शुभचिंतक हैं आपकी तुलना में।आप जब एक ध्रुव को बदलने में मशगूल थे तब समाज के इस सच्चे शुभचिंतकों को एक ही उपाय दिखा धारा के प्रवाह को बनाए रखने का और इन्होंने अपना ही ध्रुव बदल लिया।
आज जब मैं लड़कियों की तरह लंबे-लंबे बाल बढ़ाए हुए,हाथ में कंगन(bracelet),गले में सीकरी(हार),उंगली में अंगूठी,कान में बाली और शरीर पर गोदने(टैटू) गुदे हुए लड़के को देखता हूँ तो उनके प्रति मेरा सर श्रद्धा से झुक जाता है।
कुछ लड़के तो दुपट्टा वाले टी-शर्ट भी पहनने में कोई संकोच नहीं करते॥
लड़कियां इन चीजों(दुपट्टा,आभूषण) को उतारकर फेंक रही है और लड़के अपना रहे हैं।दुपट्टे को लड़कियों की इज्जत समझी जाती थी और सीना तानकर चलना लड़के की शान समझी जाती है।पर अब तो लड़कियां लड़कों की तरह गंजी(यानि T-Shirt) पहनकर अपना सीना तानकर चलती है और जिस दुपट्टे को लड़कियां पिछड़ेपन की निशानी समझ उतारकर फेंक चुकी है उसे ही लड़के अपना रहे हैं....
इसलिए आपलोग इनलोगों को जितनी भी नफरत भरी निगाहों से देखिए मैं तो इनलोगों का समाज पर उपकार मानकर इनपर अपनी आभार-दृष्टि और दयाभरी दृष्टि ही डालता हूँ।दया इसलिए कि अपने प्राकृतिक स्वभाव को बदलने में इन्हें कष्ट तो सहना ही पड़ा होगा ना......हाँ मुझे एक शिकायत तो रहती है इनलोगों से;क्योंकि पहले जहां लड़कियों से दूरी और लड़कों से नजदीकी को मेरा सभ्य संस्कार माना जाता था अब इसी संस्कार के कारण कभी-कभी लोग मुझे गलत दृष्टि से भी देखने लग जाते हैं।एक दिन मेरे कक्षा की एक लड़की ने भी मुझ पर व्यंग्य कर दिया।एम॰बी॰ए॰ कॉलेज में खुद सर ही लड़के-लड़कियों को एक-दूसरे के करीब आने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं तो ऐसे में मेरे दोस्त लोग इस अवसर का खूब लाभ उठाने लगे पर मुझे अनावश्यक किसी लड़की के करीब आना अच्छा नहीं लगा और मैंने सबसे दूरी बनाए रखी तो एक दिन एक मुँहफट लड़की ने किसी बात पर कह ही दिया कि तुम्हारे अंदर हार्मोनल प्रोब्लम चुका है।इस बात से समझ सकते हैं कि लोगों की सोच कितनी बदल चुकी है।
अगर किसी दो लड़कों में गहरी दोस्ती है और वो ज्यादा-से-ज्यादा समय एक-दूसरे के साथ बिताते हैं तो लोग उनलोगों के बीच के पवित्र दोस्ती के रिश्ते को भी समलैंगिकता के रूप में देखने लगते हैं।पुरुष समलैंगिकों के कारण आज परिस्थिति इतनी विपरीत बन चुकी है कि पहले लड़कों के लड़कियों में रुचि लेने वाले कार्य को घृणित और लड़कों में रुचि रखने वाले कार्य को सम्मानित और गर्व वाली बात समझी जाती थी पर अब तो लड़कों का लड़कियों में रुचि रखने वाली बात को ही गर्व और लड़कों में रुचि रखने वाली बात को घृणित समझा जाता है॥दोस्ती जैसा पवित्र रिश्ता भी बदनाम हो गया।पर पुरुष समाज का एक हिस्सा होने के कारण मैं किसी पर आरोप भी तो नहीं लगा सकता क्योंकि जो भी कुछ हुआ उसके जिम्मेदार हम पुरुष समाज ही तो हैं।हम लोगों ने लड़कियों के दया-करुणा, प्यार और त्याग जैसे दैवीय गुणों को उसकी कमजोरी समझा और उसका अपमान करना शुरू कर दिया।अपमान तक तो बेचारी सह रही थी लेकिन बात जब दहेज-हत्या,भ्रूण-हत्या और शारीरिक प्रताड़ना तक पहुँच गई तो नारी भी अपना नारीत्व त्यागकर कठोर और बेशर्म पुरुष समाज का एक हिस्सा बनने के लिए विवश हो गई....
इसलिए मैं इन समलैंगिकों का आभारी तो रहूँगा ही क्योंकि पुरुष समलैंगिकता जितनी बढ़ेगी लड़कियों की इज्जत उतनी ही बची रहेगी,बलात्कार जैसी घटनाओं में भी कमी आएगी,दहेज जैसे अपराध कम होंगे और ससुराल में लड़कियों पर होने वाले शारीरिक उत्पीड़न जैसे जुल्म भी खत्म होंगे।है ना??
एक और महत्त्वपूर्ण बात कि समाज के इस पतन के लिए भ्रष्टाचार भी बहुत बड़ा उत्तरदायी है।देश में युवा बेरोजगारी के कारण दर-दर की ठोकरें खा-खाकर घायल होते रहे और अपनी इंसानियत को भूलते गए दूसरी तरफ नेता स्वीस बैंक में अपनी दौलत करोड़ों से अरबों और अरबों से खरबों में बनाने में लगे रहे।बेरोजगार लोगों को पैसा कमाना ही सबसे महान कार्य महसूस होने लगा और पत्नियों का घर में रहना उसे अखरने लगा।सिर्फ पैसे ना कमाने के कारण ही पुरुषों ने पत्नियों का महत्त्व कम आंकना शुरू कर दिया।पैसे का महत्त्व बढ़ते चले जाने के साथ-साथ लड़कियों का महत्त्व घटता चला गया।पैसे के इसी लोभ ने ही दहेज-हत्या और भ्रूण-हत्या जैसे घृणित भयानक अपराधों को जन्म देना शुरू कर दिया और लड़कियों को लड़का बनने पर मजबूर कर दिया और फिर समाज में बुराई आनी शुरू हो गई...
बुराई का कारण जो भी हो पर इन समलैंगिकों से घृणा करना मुझे उचित नहीं लगता बल्कि मुझे तो दया ही आती है इनलोगों को देखकर।इसलिए इनके लिए मेरे दिल में सहानुभूति है नफरत नहीं.......।