रविवार, 28 दिसंबर 2014

मूर्ति-पूजा क्यों?

हिन्दू-विरोधी प्रश्न करते हैं कि भगवान तो अनंत हैं जिसका न आदि है ना अंत तो फिर उसे एक निश्चित आकार में बांधकर मूर्ति-पूजा क्यों?
उत्तर है कि जिस प्रकार प्यास को बुझाने के लिए पूरे समुद्र को घर में नहीं लाया जाता है बल्कि एक घड़ा पानी ही पर्याप्त होता है,उसी प्रकार हमारे लिए तो भगवान् की एक छोटी से मूर्ति ही पर्याप्त है.
OMG,P.K जैसे फिल्मों के माध्यम से यह प्रचारित किया जा रहा है कि मूर्ति-पूजा गलत है,शिवलिंग पर दूध चढ़ाना गलत है आदि-आदि.
कुछ तथ्य मैं यहाँ पर रख रहा हूँ.आपलोग स्वंय निर्णय कीजिये कि हिन्दू-धर्म में प्रचलित इन रीति-रिवाजों की आलोचना कहाँ तक उचित है.
सबसे ज्यादा कटाक्ष किया जाता है शिवलिंग पर दूध चढाने को लेकर.इसके लिए मैं एक बहुत छोटे और गरीब गाँव का उदहारण दे रहा हूँ.झारखण्ड के गोड्डा जिले में एक गाँव है धमसाय.इस गाँव में एक शिव मंदिर है.इस गाँव से करीब ५०-६० किलोमीटर दूर तक क्षेत्र में जब किसी के घर में गाय या भैंस दूध देना शुरू करती है तो लोग पहला दूध इस मंदिर में भगवान् शिव को अर्पण करते है.बहुत दूर-दूर से लोगों के आने के कारण यहाँ काफी मात्रा में दूध चढ़ाया जाता है परन्तु यहाँ एक बूँद भी दूध बर्बाद नहीं होता. पीतल की बनी हुई एक नलिका से दिन भर का सारा दूध एक बड़े से पात्र में एकत्रित कर लिया जाता है और रात में खीर बनाकर पूरे गाँव में बाँट दिया है.
ये तो एक छोटे से गाँव में हो रहा है जहाँ मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है तो ज़रा सोचिये कि बड़े-बड़े मंदिरों में जहाँ ढेर सारा दूध चढ़ाया जाता है वहाँ अगर सारा दूध एकत्रित कर लिया जाय और उस दूध को प्रसाद के रूप में गरीबों को पिला दिया जाय या खोवा ,मिठाई आदि बनाकर प्रसाद के रूप में बाँट दिया जाय तो जो लोग आज हमारी बुराई कर रहे हैं वही हमारी प्रशंसा करेंगे.
आज आवश्यकता ये है कि हिन्दू रीति-रिवाजों में थोड़ा बदलाव करके उसे अच्छा बनाएं ना कि उसका विरोध करें.अब सोचिये अगर शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ सारा दूध इकठ्ठा कर लिया जाय तो कितने ही गरीबो का पेट भरा जा सकता है पर लोगों को दूध चढ़ाने से ही मना कर दिया जाएगा तो कितने लोग गरीबों को दूध पिलाने के लिए आयेंगे. ?
शिवलिंग पर दूध चढाने से या किसी मूर्ति के सामने फूल-मिठाई अर्पण करने से हम भगवान् के साथ एक जुड़ाव महसूस करते हैं.अगर भगवान् की मूर्ति हमारे सामने ना हो तो ऐसा लगता है जैसे भगवान् हमसे बहूत दूर हैं,वो इस दुनिया में नहीं बल्कि किसी और दुनिया में रहते हैं परन्तु मूर्ति के माध्यम से हम यह एहसास करते रहते हैं वो हर पल हमारे साथ हैं और ये एहसास कि भगवान् हमेशा हमारे साथ हैं बहुत बड़ी चीज है क्योंकि ये एहसास ही हमें कोई गलत काम करने से रोकती है और अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करती है.ये एहसास ही है जो कठिन परिस्थितियों में भी हमें धैर्य धारण करने की शक्ति देती है,जब हम अपने आपको बिलकुल असमर्थ और असहाय महसूस करते हैं तो ये एहसास ही हमारा सहारा बनती है,जब हम खुद को शक्तिहीन और उर्जाहीन महसूस करने लगते हैं तो भगवान् के साथ ये जुडाव ही हमें ऊर्जा देती है क्योंकि सारी ऊर्जा का स्रोत तो ईश्वर ही हैं.जब हम प्रेम से भगवान् की मूर्ति को नहलाते-धुलाते हैं,उन्हें कपड़ा पहनाते हैं,उन्हें खाना खिलाते हैं तो हमारे दिल में प्रेम का भाव जगता है जो हरेक जीवों से प्रेम करने को प्रेरित करता है.
भगवान् के लिए अपने ह्रदय में प्रेम बढ़ाने के लिए ही हम मंदिर जाते हैं,भगवान् की कथा सुनते हैं,उनके नाम का संस्मरण करते हैं,भजन-कीर्त्तन करते हैं,उपवास करते हैं,कष्ट सहकर नंगे पाँव चलकर उनके मंदिर जाते हैं क्योंकि कष्ट सहने से हमारी सहनशक्ति बढ़ती है और भगवान् के लिए प्रेम भी.

कहने का तात्पर्य यही है कि भगवान् को फूल चढाने से,दूध पिलाने से या उनके लिए उपवास रखने से भगवान् को कोई फर्क पड़े या न पड़े पर हम पर जरुर फर्क पड़ता है क्योंकि इन सब रीति-रिवाजों को निभाने से हमारे अन्दर अच्छाईयाँ आती है...इसलिए आज आवश्यकता इन परम्पराओं को ख़त्म करने की नहीं है बल्कि इन परम्पराओं की महत्ता को लोगों को समझाने की है.पहले तो लोगों से सिर्फ धर्म के नाम पर ये सब परम्पराएं निभवा लिए जाते थे पर अब जरुरत है कि लोगों को तर्क के साथ समझाया जाय.जैसे घर में तुलसी का पौधा लगाना या सब्जी में हल्दी डालना पहले धर्म या परंपरा के नाम करवाया जाता था जबकि अब इन सब के लिए वैज्ञानिक कारण समझाना पड़ता है.

1 टिप्पणी:

  1. aapne sahi keha hai, aur meri soch ko bal diya hai. Aapka dhanyawaad. Mera maananaa hai ki Gau Palan se poora Bharat hi nahi poora Vishw hi khada ho sakta hai aur Sanatan ban sakta hai jismain Daya hai Keruna hai aur Aurat ki shakti ko pehchanene ki samajh hai. Krishna...

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