मंगलवार, 6 जनवरी 2015

जब पूरा विश्व दीवाना था भारतीय कपड़ों का.....

क्या आपको पता है कि अठारहवीं शताब्दी तक जब तक कि यूरोप में औद्योगिक क्रांति नहीं आई थी तब तक यूरोप,  अरब, चीन सहित पूरे विश्व को कपडे हम भारतीय ही पहनाया करते थे.यूरोप में तो बाद में सभ्यता आई पर मिश्र जो भारत की समकालीन है उसे भी हमने ही कपडे पहनाये हैं.वहाँ पाए जाने वाले ममी में भारतीय मलमल के टुकड़े प्राप्त हुए हैं.ऐसा इसलिए कि सबसे पहले कपास की खेती हमने ही शुरू की थी और वस्त्र उद्योग में महारत हासिल कर ली थी हमने.पूरा विश्व भारतीय कपड़ों का दीवाना था.विदेशी भारतीय कपड़ों को पहनकर गर्व महसूस करते थे.और चूंकि वहाँ के राजे-महाराजे भारतीय कपडे पहना करते थे इसलिए आम लोगों की नजर में भारतीय पोशाकों की एक अलग इज्जत थी.इन सबके बावजूद एक बार ब्रिटेन के राजघराने में भारतीय कपड़ों पर रोक लगा दी गई थी.जानते हैं क्यों? क्योंकि उस समय भारत ने औरतों के लिए कमर के नीचे पहनने वाला एक ऐसा पोशाक तैयार किया था जो पारदर्शी था.जाहिर सी बात है कि इस तरह का पोशाक भारतीयों ने सिर्फ अंग्रेजों के लिए तो नहीं ही बनाया होगा बल्कि वो पोशाक खुद भारतीय भी पहनते होंगे.
ये सब बहुत पुरानी बाते क्यों बता रहा हूँ मैं??इसलिए कि आज जब मैं अपने भारत में लोगों की पश्चिमी कपड़ों के प्रति दीवानगी देखता हूँ तो दुःख होता है .आज तन दिखने वाले कपडे पहनना आधुनिकता का पर्याय माना जाता है जबकि पूरे कपडे पहनना पिछड़ेपन का.अगर तन दिखने वाला कपड़ा पहनना ही आधुनिकता है तो वो तो हम अठारहवीं शताब्दी में ही कर चुके हैं,तो इस हिसाब से भी भारतीय पिछड़े हुए कहाँ हैं.
आज आधुनिकता को नंगापनी और सेक्स से मापा जाता है.अगर सेक्स पर खुलेआम चर्चा करने को ही आधुनिकता का आधार बनाया जाय फिर भी हम विश्व से बहुत आगे हैं.विश्व की पहली सेक्स पर लिखी गई पुस्तक कामसूत्र है जो महर्षि वात्सयायन ने लिखी थी और ये उन्नीसवीं सदी में यूरोप पहुँची.और आपको आश्चर्य होगा कि आप जिस ब्रिटेन को इतना खुला मानसिकता वाला समझते हैं वहाँ इस पुस्तक ने कोहराम मचा दिया.काफी विवाद हुआ था इस पर तब जाके इस पुस्तक को स्थान दिया गया उस देश में.
इसके अलावे अगर नग्न होना या खुले में सेक्स करना ही आधुनिकता है तो जाकर खजुराहो में देख लीजिये.हमने तो आज से हजारों साल पहले सातवीं सदी में ही सेक्स करते हुए लोगों की नग्न मूर्तियाँ बना दी है.और ऐसी हिम्मत तो शायद अभी भी कोई पश्चिमी देश न कर पायें.
जिस समय हम अंतरिक्ष के गोलों के साथ खेल रहे थे उस समय पूरा विश्व गुल्ली-डंडे खेल रहा था.जिस समय हम यज्य में अन्न की आहुति दे रहे थे उस समय पश्चिमी देश अन्न के एक-एक दाने के लिए तरस रहा था.इतनी विकसित सभ्यता रही है हमारी .फिर क्यों आज हम खुद पर भरोसा करने के बजाय पश्चिमी देशों के पीछे भाग रहे हैं???
ये लेख मैंने उनलोगों के लिए लिखा है जो यह समझते हैं कि भारत हमेशा से पिछड़ा हुआ देश रहा है और विदेशी हमेशा से विकसित रहे हैं.और मुझे दुःख भी है कि भारत को प्राचीन काल में विकसित देश साबित करने के लिए मुझे कपडे और  सेक्स का सहारा लेना पड़ा.पर ये मेरी मजबूरी है क्योंकि अभी के युवा बस इसी की भाषा समझ रहे है.अगर मैं ये कहूंगा कि आज से हजारों साल पहले भारत में प्लास्टिक-सर्जरी हुआ करती थी तो लोग विश्वास नहीं करेंगे और हँसेंगे मुझपर.कुछ दिन पहले जब विज्ञान कांग्रेस में यह भाषण दिया जाने वाला था कि प्राचीन भारतीयों को विमान बनाने की तकनीक पता थी तो लोग हंस रहे थे और मजाक बना रहे थे..
प्राचीन काल में भारत अगर खरगोश था तो पूरा विश्व कछुआ था लेकिन घमंड में चूर भारत सो गया और कछुआ खरगोश से बहुत आगे निकल गया.आवश्यकता इस बात की है कि हम खुद को पहचाने.अपने आप पर भरोसा करें और पश्चिमी देशों के पदचिह्नों पर चलने की बजाय हम अपना रास्ता खुद बनायें.

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